"अरे उस झण्डू से क्या बात करनी, वो साला तो बिल्कुल जीरो है।
खुद बेशक जीरो हो पर बड़ा जुगाड़ी है भाई साहब।
हाँ देख रखे है उसके जुगाड़, याद है वो जब म्यूनिसिपलिटी ऑफिस में काम करवाना था तब भी बड़ी-बड़ी डींगे हाँक रहा था। *** ने तब भी सारे काम की माँ-बहन करवा दी थी। खुद भी जीरो, जुगाड़ भी जीरो। और जीरो को जीरो में जोड़ोगे तो जीरो ही निकलेगा। और तेरे को भी सलाह है के ऐसे लोगो से दो गज दूरी बना के ही चलो वरना तुम्हें पता भी नहीं लगेगा और खुद भी जीरो हो जाओगे। "
उस बाइक सर्विस सेंटर के मालिक और उसके मुलाज़िम की बात सुन कर अनायास ही मेरा ध्यान "जीरो" शब्द पर केंद्रित हो गया।
"अरे वो जो तेरा जानकार दिल्ली रहता है उससे बात करके देख। शायद वो कुछ करवा पाए।
उसके बस की नहीं है यार। वो ख़तम आदमी है।
कितना ख़तम है मतलब जीरो तो नहीं है ना? "
"अरे वो शाहरुख़ की नयी फिल्म देखी क्या?
कौन सी..... जीरो?
हाँ? कैसी है?
एकदम अपने टाइटल की तरह। "
ऊपरोक्त जैसे कथन आपको हर जगह की चर्चा में सुनने को मिल जायेंगे चाहे वो किसी भी वर्ग या जगह का विचार-विमर्श हो। कहने का तरीका थोड़ा भिन्न हो सकता है पर सबका निचोड़ एक समान ही होता है। और निचोड़ ये होता है के जीरो शब्द का उपयोग ज्यादातर किसी का उपहास उड़ाने के लिए या फिर छवि को नुक्सान पहुंचाने के लिए किया जाता है। किसी की क्षमता पर उल्टे ढंग से टिप्पणी करने के लिए अक्सर इस शब्द को इस्तेमाल किया जाता है।
जीरो गणितज्ञों के लिहाज से बड़ा महत्वपूर्ण है। अंक के आगे लगे या पीछे, इस बात का बड़ा महत्व है। लेकिन जब इसे किसी के व्यक्तित्व के साथ जोड़ा जाता है चाहे इसे जोड़ने का कोण/दृष्टिकोण किसी भी दिशा की तरफ हो, इंसान की छवि बिगाड़ने का ही काम करता है। ज्यादातर लोग "जीरो" शब्द को किस तरह लेते है? मेरे हिसाब से जीरो शब्द को समाज में एक गाली की तरह इस्तेमाल किया जाता है। इसका उपयोग गाली की तरह सुनने में भद्दा तो नहीं लगता पर इंसान को जीरो सम्बोधित होने पर अंदरूनी चोट ज़रूर लगती है ऐसा लगता है जैसे किसी ने थप्पड़ मार दिया हो या फिर मर्दानगी पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिया हो। ज्यादातर लोग अनजाने में (शायद बिना इस बात का अंदाजा लगाए के इस शब्द का अगले की मन:स्थिति पर क्या प्रभाव पड़ेगा) अपने किसी ख़ास मित्र या परिचित के साथ मजाक में उन्हें जीरो सम्बोधित कर देते है और वो मित्र/परिचित भी हंस के बात को टाल देता है पर उस हंसी के पीछे अहंकार को एक बड़ी ठेस पहुंची होती है और शायद उसकी आत्मा एक लम्बे समय तक अपने आप को कचोटती रहती है।
मैं अपनी मोटर साइकिल की सर्विस कराके जैसे ही सेंटर से निकला और मेन रोड़ तक पहुँचा तो मुझे ध्यान आया के बैलेंस बचे 35 रूपये तो मैंने वापिस ही नहीं लिए। मैंने अपनी मोटर साइकिल को सेंटर की तरफ मोड़ा पर कुछ आगे चलने के बाद मैं वापिस मेन रोड़ की तरफ मुड़ गया। मेरे दिमाग में ये चल रहा था कहीं मैं वापिस जा के 35 रूपए मांगूँगा तो कही वो सर्विस सेंटर वाला मुझे जीरो ना घोषित कर दे। सामने सामने तो वो निश्चित ही नहीं बोलता पर उसकी आँखों से मुझे उसकी अनकही भावनाएँ तो समझ आ ही जाती। और वो जिल्लत का एहसास मैं अनुभव नहीं करना चाहता था।
और जीरो के बारे में इतना मंथन करने के बाद मैंने ये तय किया के आज के बाद किसी के व्यक्तित्व के लिए इस शब्द का उपयोग नहीं करूंगा।

No comments:
Post a Comment